भारत में लंबे समय से चल रहा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी (सीपीआई-माओवादी) उग्रवाद, जिसे कभी देश की “सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती” कहा गया था, एक ऐतिहासिक मोड़ पर पहुंच गया है। 22 फरवरी 2026 को थिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी (60), जो सीपीआई-माओवादी के महासचिव, रणनीतिकार और सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (सीएमसी) के प्रमुख थे, ने तेलंगाना पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। उनका आत्मसमर्पण दशकों में उग्रवाद को झेलना पड़ा सबसे बड़े झटकों में से एक माना जा रहा है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, देवजी और मल्ला राजी रेड्डी उर्फ संग्राम (76), जो ‘केंद्रीय समिति (सीसी)’ और ‘पोलित ब्यूरो’ के सदस्य थे, ने 21 अन्य कैडरों के साथ तेलंगाना पुलिस के स्पेशल इंटेलिजेंस ब्यूरो (एसआईबी) के सामने आत्मसमर्पण किया। देवजी का आत्मसमर्पण केवल एक सामरिक क्षति नहीं है दृ यह आंदोलन की केंद्रीय तंत्रिका प्रणाली के प्रतीकात्मक पतन को दर्शाता है। यह घटना केंद्रीय गृह मंत्रालय की 31 मार्च की वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) समाप्त करने की समयसीमा से कुछ सप्ताह पहले हुई, जो दशकों पुराने संघर्ष में निर्णायक बदलाव का संकेत देती है।
देवजी का आत्मसमर्पण सीपीआई-माओवादी की संगठनात्मक संरचना के लिए गंभीर व्यवधान का प्रतीक है। वे एक लंबे समय तक कमांडर और रणनीतिकार रहे, जिन्होंने कथित तौर पर नंबाला केशव राव उर्फ बसवा राजू का स्थान लिया था, जिन्हें 21 मई 2025 को सुरक्षा बलों ने एक बड़े अभियान में मार गिराया था। देवजी संगठन की सैन्य योजना और पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) के संचालन में केंद्रीय भूमिका निभा रहे थे।
अधिकारियों ने उनके बाहर होने को प्रतिबंधित संगठन की कमान और समन्वय के लिए “घातक आघात” बताया है। देवजी जैसे वरिष्ठ नेता का पकड़ा जाना या आत्मसमर्पण असामान्य है और यह संकेत देता है कि वरिष्ठ माओवादी नेतृत्व बस्तर, अबूझमाड़ और आसपास के वन क्षेत्रों जैसे मुख्य इलाकों में गुरिल्ला अभियानों को बनाए रखने में कठिनाई का सामना कर रहा है। भर्ती, कैडरों को बनाए रखना और हथियारों के भंडार को सुरक्षित रखना, सुरक्षा बलों के निरंतर दबाव के बीच चुनौतीपूर्ण हो गया है।
देवजी का आत्मसमर्पण कर्रेगुट्टा पहाड़ियों (तेलंगाना और छत्तीसगढ़ की सीमा) में महीनों से चल रहे समन्वित सुरक्षा अभियानों के बाद हुआ, जहां अधिकारियों ने कथित तौर पर संचालन ठिकानों को ध्वस्त किया, विस्फोटक उपकरण बरामद किए और नेतृत्व समूहों तथा संचार लाइनों को लगातार निशाना बनाया।
सरकार की वह नीति, जिसमें बल के प्रयोग की चेतावनी के साथ सामाजिक-आर्थिक प्रोत्साहन भी शामिल हैं, पिछले दो वर्षों में आत्मसमर्पण की लगातार बढ़ती संख्या में योगदानकारी रही है। अधिकारियों का दावा है कि सैकड़ों माओवादी नेता और कैडर ऐसी योजनाओं के माध्यम से ‘मुख्यधारा समाज’ में लौट चुके हैं।
देवजी का आत्मसमर्पण एक उत्प्रेरक की भूमिका निभा सकता है, जिससे शेष माओवादी कैडरों में व्यापक दलबदल हो सकता है, मनोबल और संगठनात्मक एकता कमजोर हो सकती है, और सशस्त्र संघर्ष जारी रखने को लेकर पार्टी में विभाजन उत्पन्न हो सकता है। हालांकि, कट्टरपंथी गुटों का एक छोटा वर्ग अंत तक लड़ने का विकल्प चुन सकता है। इसलिए संगठित उग्रवाद की पूर्ण पराजय की घोषणा करना अभी जल्दबाज़ी होगी। नेतृत्व की क्षति के बावजूद, घने जंगलों में सशस्त्र कैडरों के कुछ समूह अभी भी सक्रिय हैं। साथ ही, जब तक विद्रोह को जन्म देने वाले संरचनात्मक मुद्दों का सार्थक समाधान नहीं होता, तब तक सशस्त्र विद्रोह की वैचारिक अपील बनी रह सकती है, भले ही उसकी संचालन क्षमता कम हो जाए।
देवजी का आत्मसमर्पण भारत की माओवादी उग्रवाद के खिलाफ लंबी लड़ाई में एक रणनीतिक मोड़ है। यह सतत सुरक्षा दबाव, पुनर्वास की रणनीतिक नीतियों और सीपीआई-माओवादी के भीतर बढ़ती संगठनात्मक कमजोरी के प्रभाव को दर्शाता है। फिर भी, इसे उग्रवाद का अंतिम अंत घोषित करना सरलीकरण होगा। नेतृत्व में रिक्तता और लगातार आत्मसमर्पण संचालन क्षमता को कमजोर करते हैं, लेकिन संघर्ष की संरचनात्मक जड़ें, कैडर नेटवर्क की वितरित प्रकृति और प्रभावित क्षेत्रों की सामाजिक-आर्थिक चुनौतियां भविष्य की दिशा तय करने में निर्णायक रहेंगी।
लेखक- दीपक कुमार नायक
रिसर्च एसोसिएट, इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट