गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, जैविक खेती और मजबूत बाजार व्यवस्था पर जोर
दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ शुभारंभ
बेहतर बाजार व्यवस्था और युवा उद्यमिता को इस क्षेत्र के विकास के प्रमुख आधार बताया
श्रीनगर। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध केंद्र में सोमवार को राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड, भारत सरकार की परियोजना के अंतर्गत दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। संगोष्ठी में हिमालयी क्षेत्र की पर्यावरणीय चुनौतियों, बदलते भू-उपयोग एवं भू-आवरण, जलवायु परिवर्तन, कृषि, औषधीय पादप संसाधनों और ग्रामीण आजीविका से जुड़े विषयों पर विशेषज्ञों ने विचार-विमर्श किया। वक्ताओं ने शोध को केवल अकादमिक प्रकाशनों तक सीमित न रखकर स्थानीय समुदायों और गांवों की वास्तविक समस्याओं के समाधान से जोड़ने पर जोर दिया। राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड, नई दिल्ली के सीईओ डॉ. महेश के. दधिच ने कहा कि औषधीय एवं सुगंधित पौधों के क्षेत्र के विकास के लिए वैज्ञानिक ज्ञान को व्यावहारिक कार्यों से जोड़ना जरूरी है। उन्होंने गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, जैविक एवं टिकाऊ खेती, बेहतर बाजार व्यवस्था और युवा उद्यमिता को इस क्षेत्र के विकास के प्रमुख आधार बताया। डॉ. दधिच ने कहा कि उपयुक्त मौसम, अच्छी भूमि, गुणवत्तापूर्ण जल और उत्तम बीज औषधीय पौधों की गुणवत्ता और उत्पादकता निर्धारित करने वाले महत्वपूर्ण घटक हैं। हिमालयी क्षेत्र की प्राकृतिक एवं पारिस्थितिकी परिस्थितियां उच्च गुणवत्ता वाले औषधीय और सुगंधित पौधों के उत्पादन के लिए अनुकूल हैं। ऐसे में यह क्षेत्र औषधीय पादप खेती का प्रमुख केंद्र बनने की क्षमता रखता है। उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में जैविक और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। कहा कि खेती, संग्रहण और प्रसंस्करण से जुड़े पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जोड़ा जाना चाहिए, जिससे गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के साथ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो सके। डॉ. दधिच ने दुर्लभ, संकटग्रस्त और उच्च मूल्य वाली औषधीय वनस्पतियों के लिए गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री की उपलब्धता को महत्वपूर्ण बताया। कहा कि प्रमाणिक एवं गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री की उपलब्धता सफल खेती के साथ-साथ औषधीय पौधों के संरक्षण के लिए भी आवश्यक है। उन्होंने एक जड़ी-बूटी-एक जिला की अवधारणा को बढ़ावा देने का सुझाव देते हुए कहा कि प्रत्येक जिले की जलवायु, मिट्टी और उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप औषधीय फसलों का चयन कर क्षेत्र-विशेष की पहचान विकसित की जा सकती है। इससे किसानों की आय बढ़ाने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे। उन्होंने किसानों और उद्यमियों के लिए डिजिटल सूचना संसाधनों की उपयोगिता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड की वेबसाइट समेत उपलब्ध संसाधनों के माध्यम से खेती, तकनीक और उद्यम से जुड़ी जानकारी हासिल करने की बात कही। उन्होंने कहा कि किसी नई औषधीय फसल अथवा उद्यम को अपनाने से पहले उसकी तकनीकी और आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन किया जाना चाहिए, ताकि किसान सोच-समझकर निर्णय ले सकें। डॉ. दधिच ने औषधीय पौधों के लिए संगठित हर्बल मंडियों और समर्पित बाजार व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मजबूत बाजार संपर्क से किसानों को उपज के बेहतर अवसर मिलेंगे और औषधीय पौधों की खेती को आर्थिक रूप से व्यवहार्य गतिविधि के रूप में बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने युवाओं से औषधीय एवं सुगंधित पौधों के क्षेत्र में उद्यमिता अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि यह क्षेत्र रोजगार, स्वरोजगार और आजीविका के नए अवसर उपलब्ध करा सकता है।
इस मौके पर कुलसचिव प्रो. वाईपी रैवानी, डीन एग्रीकल्चर एंड एलाइड साइंस प्रो. आरएस नेगी, अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. ओपी गुसांई, बिड़ला परिसर के निदेशक प्रो. एचबीएस चौहान, प्रो. एमएम सेमवाल के साथ हैप्रेक के निदेशक प्रो. विजयकांत पुरोहित, डॉ. बबिता पाटनी, संगोष्ठी की सचिव डॉ. विजयलक्ष्मी त्रिवेदी, जन संपर्क अधिकारी आशुतोष बहुगुणा सहित आदि मौजूद थे।
आपदाओं के प्रति संवेदनशील है हिमालयः पंवार
विशिष्ट अतिथि गढ़वाल विश्वविद्यालय के डीन रिक्रूटमेंट एवं पदोन्नति प्रो. मोहन सिंह पंवार ने हिमालय की भौगोलिक एवं पारिस्थितिक संवेदनशीलता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिमालय प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र है। बदलते भू-उपयोग एवं भू-आवरण, जनसंख्या स्वरूप और कृषि पद्धतियों में हो रहे बदलावों का प्रभाव यहां की पारंपरिक कृषि व्यवस्था पर भी पड़ रहा है। उन्होंने किसानों को समयानुकूल प्रशिक्षण और मौसम संबंधी वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराने की जरूरत बताई। कहा कि इससे किसान फसल चयन, बुवाई के समय और कृषि पद्धतियों को लेकर बेहतर निर्णय ले सकेंगे। उन्होंने पारंपरिक मिश्रित खेती के स्थान पर बढ़ते एकल फसल चलन को कृषि विविधता और हिमालयी कृषि की लचीली क्षमता के लिए चुनौती बताया। साथ ही गुणवत्तापूर्ण पौध रोपण सामग्री की कमी को कृषि एवं बागवानी विकास में प्रमुख बाधाओं में शामिल किया।
औषधीय पादपों के प्रमाणिक कच्चे माल की जरूरतः डॉ. त्रिपाठी
उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय, देहरादून के कुलपति डॉ. अरुण कुमार त्रिपाठी ने कहा कि स्वास्थ्य व्यवस्था में अब बीमारी के उपचार के साथ स्वास्थ्य संवर्धन पर भी अधिक जोर दिया जा रहा है। इससे गुणवत्तापूर्ण औषधीय पादप कच्चे माल और प्रमाणित हर्बल उत्पादों की मांग बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान मांग के अनुरूप पर्याप्त और प्रमाणिक कच्चा माल उपलब्ध नहीं होने के कारण मिलावट और अनुपयुक्त विकल्पों के इस्तेमाल की आशंका बनी रहती है। उन्होंने औषधीय पौधों का उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग देने की जरूरत बताई। साथ ही जैविक एवं टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने तथा उत्पादन से लेकर संग्रहण, गुणवत्ता परीक्षण और उपयोग तक विभिन्न स्तरों पर समन्वित व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया। डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि औषधीय पौधों की गुणवत्ता उनके संग्रह के समय, भौगोलिक स्थिति, मिट्टी, जलवायु और प्रसंस्करण जैसी परिस्थितियों से प्रभावित होती है। इसलिए औषधीय पादप सामग्री के संग्रह, रखरखाव और प्रसंस्करण के लिए वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित मानक विकसित किए जाने जरूरी हैं।