मिड डे मील के हक से महरूम अल्पसंख्यक समाज के बच्चे

शिक्षा विभाग बच्चों की उम्मीदों को फाइलों में धुमा रहा
452 मदरसों के बच्चों को शिक्षा विभाग मिड डे मील की सुविधा देता था

देहरादून। उत्तराखंड में अल्पसंख्यक समाज से जुड़े बच्चों के लिए नई व्यवस्था ने बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है। यूं तो अल्पसंख्यक छात्रों को नई शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने और उनके बेहतर भविष्य के लिए राज्य सरकार ने मदरसा बोर्ड भंग करने का दावा किया था। लेकिन यही व्यवस्था अब इन तमाम बच्चों के मिड डे मील पर भारी दिख रही है।
दरअसल, उत्तराखंड में अब तक मदरसा बोर्ड से पंजीकृत 452 मदरसों के बच्चों को शिक्षा विभाग मिड डे मील की सुविधा देता था लेकिन अब अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की नई व्यवस्था लागू होने के बाद इन बच्चों को मिड डे मील से महरूम कर दिया गया है। हैरानी की बात यह है कि लगातार शिक्षा विभाग से इन बच्चों के लिए मिड डे मील की व्यवस्था करने की मांग की जा रही है लेकिन शिक्षा विभाग है कि इस सुविधा को सरकारी फाइलों में जलेबी की तरह घुमा रहा है।
राज्य में 1 जुलाई से उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की व्यवस्था लागू कर दी गई, इससे पहले चल रहा मदरसा बोर्ड समाप्त किया गया। इस तरह से 3 महीने से ज्यादा का वक्त हो चुका है जब राज्य में अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण काम कर रहा है। इस दौरान राज्य के 452 मदरसों को मदरसा बोर्ड भंग होने के बाद प्राधिकरण से पंजीकृत करवाने की कोशिश भी चल रही है।
लेकिन इन सभी प्रयासों के बीच चिंता की बात यह है कि इतने समय से मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को मिड डे मिल ही नहीं मिल पा रहा है। हैरानी की बात यह है कि प्राधिकरण खुद बार-बार शिक्षा विभाग को चिट्ठी लिखकर अल्पसंख्यक समाज के बच्चों के लिए मिड डे मील की व्यवस्था करने की बात कहता रहा है। इसके पीछे तर्क देते हुए यह बात भी कही जाती रही है कि पूर्व में भी मदरसों को मिड डे मील की सुविधा दी जा रही थी ऐसे में जो मदरसे पंजीकृत हो रहे हैं उन्हें मिड डे मील की सुविधा दी जाए।
उत्तराखण्ड शिक्षा प्राधिकरण के अध्यक्ष सुरजीत गांधी ने कहा कि कई बार पत्र लिखने के बाद भी शिक्षा विभाग मदरसों के बच्चों को मिड डे मील नहीं दे रहा। इसके बाद अब शासन से यह गुजारिश की गई है कि विभाग के साथ बैठक करते हुए इससे संबंधित निर्णय जल्द से जल्द लिया जाए। उत्तराखंड में कुल 452 मदरसों में से 245 मदरसे नई व्यवस्था लागू होने के बाद बंद किए जा चुके है। इसमें 17 मदरसे सील किए गए हैं और एक मदरसे से अबतक कोई आवेदन ही नहीं आया है। उधर करीब 130 मदरसे ऐसे हैं जिनके रजिस्ट्रेशन के आवेदन शिक्षा विभाग में लटके पड़े हैं।
इस तरह देखा जाए तो मदरसों को लेकर राज्य में स्थिति असमंजस की ही बनी हुई है। बड़ी बात यह है कि मिड डे मील जैसी जरूरी सुविधा पर भी तुरंत निर्णय लेने के बजाय मामला फाइलों में ही लटकाया जा रहा है। इससे पहले भारत सरकार के एक पत्र में यह स्पष्ट किया गया था कि तमाम मदरसों में बच्चों को मिड डे मील की सुविधा दी जाए और इसी पत्र के आधार पर शिक्षा विभाग यह सुविधा दे भी रहा था, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि अब शिक्षा विभाग नई व्यवस्था लागू होने के बाद इन संस्थाओं को मदरसा मन ही नहीं रहा।

नई व्यवस्था लागू होने से मिड डे मील दिया जाना हुआ ना मुमकिनः रावत
प्रभारी निदेशक प्रारंभिक शिक्षा कुंवर सिंह रावत ने कहा कि पूर्व में यह मदरसे मदरसा बोर्ड से पंजीकृत थे इसलिए भारत सरकार के पत्र के अनुसार इन्हें मिड डे मील दिया जा रहा था। लेकिन अब नई व्यवस्था लागू होने के बाद यह एक निजी विद्यालय हो गए, इसलिए इन्हें मिड डे मील दिया जाना मुमकिन नहीं है। हालांकि इस पर अभी बातचीत का दौर जारी है।
इस नई व्यवस्था के लागू हुए 3 महीने से ज्यादा का वक्त बीत चुका है लेकिन अब तक शिक्षा विभाग इस अजमंजस की स्थिति से उबर ही नहीं पाया है। हालत यह है कि कागजों में फिलहाल इन बच्चों को भोजन से जुड़ी इस सुविधा पर नतीजा नहीं मिल पा रहा। इससे भी बड़ी बात यह है कि जिन संस्थाओं को अब तक शिक्षा विभाग मदरसा मान रहा था अब नया नाम मिलने के बाद उन्हें विभाग मदरसा मानने से ही इनकार कर रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि जल्द ही भारत सरकार को इस संदर्भ में एक पत्र भेजा जा सकता है, ताकि इस पर स्थिति स्पष्ट की जा सके और गरीब परिवार से आने वाले इन बच्चों को पहले की तरह ही एक बार फिर मिड डे मील की सुविधा मिल सके।

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