पछवाड़ा कोयला खदान पावरकॉम के लिए बनी सोने की खान, पहली छमाही में 564 करोड़ का लाभ

चंडीगढ़।झारखंड स्थित पंजाब को अलॉट हुई पछवाड़ा कोयला खदान पावरकाॅम के लिए सोने की खान साबित हो रही है। पहली छमाही में पावरकॉम ने 33 लाख मीट्रिक टन कोयले करके इसे राज्य के पॉवर थर्मल प्लांटों में लाने के ऑपरेशन से उसे 564 करोड़ रुपए का लाभ हुआ है जबकि पिछले साल इसी अवधि के दौरान पावरकॉम ने 1800 करोड़ रुपए का घाटा उठाया था।

खानों में पानी भरा होने के चलते खनन करने में हुई देरी

सात साल की कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद मिली पछवाड़ा कोल माइन से यदि इसी तरह कोयला आता रहा तो निश्चित तौर पर पावरकॉम आने वाले कुछ समय में ही अपने घाटों को पूरा कर लेगा जो उसे महंगा कोयला खरीदने के कारण हुआ है। हालांकि सरकार को कोयला खाद पिछले साल ही मिल गई थी लेकिन खानों में पानी भरा होने के कारण यहां से खनन काफी देरी से शुरू हुआ।

पिछले साल 3 हजार करोड़ रुपए हुए अतिरिक्त खर्च

पावरकॉम के चेयरमैन बलदेव सिंह सरां ने बताया कि कोयले की कमी के कारण हमें विदेशों से जहां कोयला आयात करना पड़ रहा था वहीं, बिजली की बढ़ती खपत को पूरा करने के लिए महंगे दामों पर बिजली भी खरीदनी पड़ी थी जिस कारण पिछले साल 3000 करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च किए गए। इस साल हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि हमारे अपने कोयले का उपयोग पंजाब में लगे हमारे सरकारी और निजी थर्मल प्लांटों में किया जाए। हमने किसी को कोयला आयात करने की इजाजत नहीं दी है।

विदेश से आयात होने वााले कोयले पर रहना पड़ता है निर्भर

काबिले गौर है कि पछवाड़ा कोल माइन की लड़ाई छोटी नहीं रही है बल्कि एक दशक के लगभग समय इसे प्राप्त करने में लगा है। 24 दिसंबर को 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने 1993 से लेकर 2010 तक अलाट की गई 218 कोयला खानों के आवंटन में से 204 कोयला खदानें रद्द कर दीं। हालांकि 31 मार्च, 2015 को पछवाडा कोल माइन फिर से पावरकाम को मिल गई लेकिन यह अदालती मुकदमेबाजी में फंस गई। आठ साल तक पंजाब को इससे एक किलोग्राम भी कोयला नहीं मिल सका। कोल माइन न चलने के कारण राज्य को अपने थर्मल प्लांटों को चलाने के लिए दूसरी खानों और विदेशों से आयात होने वाले कोयले पर निर्भर होना पड़ा।

साल 2001 में पीएसपीसीएल को किया गया था आवंटित

पछवाड़ा सेंट्रल कोयला ब्लॉक को वर्ष 2001 में पीएसपीसीएल को आवंटित किया गया था। इसमें से कोयला निकालने और सप्लाई के लिए पीएसपीसीएल और मेसर्स ईएमटीए कोल लिमिटेड ने पैनेम कोल माइंस लिमिटेड नाम से एक संयुक्त उद्यम कंपनी बनाई और मार्च 2006 में कोयले की आपूर्ति शुरू की। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने जब ज्यादातर कोल खदानों को रद कर दिया तो खनन का काम रुक गया। मार्च 2015 में इसे पंजाब को फिर से आवंटित कर दिया गया। राज्य ने एक वैश्विक निविदा जारी करके इसका काम शुरू करना चाहा लेकिन मुकदमेबाजी के कारण यह प्रक्रिया रुक गई।

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने फैसला किया रद

2018 में, पीएसपीसीएल ने नई वैश्विक निविदाएं जारी कीं और मेसर्स दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड (डीबीएल) और वीपीआर माइनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर (वीपीआर) कंसोर्टियम का चयन किया। लेकिन ईएमटीए (पीएसपीसीएल के पूर्व खदान डेवलपर और ऑपरेटर के साथ कानूनी मुद्दों के कारण काम रुक गया । ईएमटीए ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी थी। 25 जनवरी 2019 को हाई कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला ईएमटीए के पक्ष में सुनाया। पावरकॉम ने हाई कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी लेकिन कोरोना के कारण सुनवाई टलती रही। आखिरकार पिछले साल सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने पीएसपीसीएल के पक्ष में फैसला सुनाया और पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के फैसले को रद कर दिया गया।

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